सरकार का कंपनियों (LIC, AIR INDIA ) को बेचने का जाल बहुत गहरा है समझिये साधारण मगर पूर्ण भाषा में।

नमस्कार दोस्तों ये सवाल जवाब सेशन का पहला आर्टिकल है जिसमे हम जानेंगे की आखिर सरकार अपनी कंपनियों को क्यों बेच रही है और इसके पीछे के महत्वपूर्ण कारण क्या है। इस सवाल का जवाब हमारे लिए महत्वपूर्ण है क्यूंकि कुछ लोग सरकार के इस कदम का विरोध कर रहे है, विरोध सही है किन्तु विरोध अगर बिन आधार हो, लोगो को गलत सलत जानकारिया देकर बरगलाने की कोशिश की जा रही हो, तो उनको जवाब देना महत्वपूर्ण हो जाता है। 

ये पोस्ट थोड़ा बरा हो सकता है, किन्तु इस पोस्ट को पूरा पढ़े के बाद आप इंडियन इकॉनमी को तक़रीबन तक़रीबन पूरा समझ जायेंगे और हर बार जो आपका ये शिकायत रहता है की बजट सत्र क्यों देखे समझ ही नहीं आता तो इस पोस्ट को पढ़ने के बाद आप अगली बार से नहीं जानने का बहाना कभी नहीं मार पायेंगे।



क्या जानेंगे इस आर्टिकल में हम 
  1. टैक्स सिस्टम और कितने प्रकार का होता है ये टैक्स सिस्टम 
  2. बजट 
  3. सरकार कहाँ से पैसा कमाती है 
  4. सरकार कहाँ पैसा खर्च करती है 
  5. सरकार का नफा और नुक्सान क्या है 
  6. सरकार बहुत सारा पैसा छाप कर आमिर क्यों नहीं बन जाती 
  7. सरकार कंपनियों को क्यों बेच रही है 
  8. इंडियन एयरलाइन्स और एलआईसी को क्यों बेचा जा रहा है 


KEY POINTS देख कर पता चल गया होगा की ये पोस्ट कितना जरुरी है, तो तैयार हो जाइये, अगले 15 मिनट INDIAN ECONOMY के नाम :


टैक्स सिस्टम 

‘आयकर’ शब्द आपने बहुत बार सुना होगा,  इंग्लिश में इसे इनकम टैक्स कहते है।


टैक्स ! इस शब्द से भी आप परिचित हैं। इसके कई उपनाम भी सुने होंगे, मसलन इनकम टैक्स, प्रॉपर्टी टैक्स, वेल्थ टैक्स, सेल्स टैक्स, परचेज टैक्स, कॉरपोरेट टैक्स, सर्विस टैक्स, और हाल में सबसे ज्यादा चर्चाओं में मौजूद गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स वगैरह। अगर आप इनमें से कोई टैक्स भरते हैं तो थोड़ी गहराई से जानने की इच्छा भी हुई होगी।


अब सरकार नागरिकों से टैक्स क्यों वसूलती है ? 

दरअसल  हमारे देश को चलाने में जो खर्च आता है वह इसी टैक्स के जरिए भरा जाता है,  जिसमे सरकार को  काफी रकम खर्च करना पड़ता है. इसमें सड़क, बिजली-पानी से लेकर सुरक्षा और प्रशासन पर आने वाले खर्च इत्यादि और भी बहुत कुछ  शामिल हैं. किसानों और गरीब लोगों को विभिन्न सुविधा पर दी जाने वाली सब्सिडी  या राज्यों को दिया जाने वाला अनुदान (मदद) आदि भी इन खर्च में शामिल है।

भारत में दो तरह के टैक्स लिए जाते है। दिखाई देने वाला कर मतलब लोगों की आमदनी में से कुछ हिस्सा लेना और दूसरा होता है दिखाई न देने वाला कर अर्थात  सेवाओं और वस्तुओं के उपयोग पर टैक्स लगाना।  यह ऐसा टैक्स है जिसे हर भारतीय को भरना पड़ता है। इन टैक्स को सरकारी भाषा में प्रत्यक्ष (डायरेक्ट टैक्स) और अप्रत्यक्ष (इनडायरेक्ट टैक्स) कर के नाम से जाना जाता है।


भारत में Tax System दो हिस्सो में बंटा हुआ है। 

  1. Direct Taxes 
  2. Indirect taxes

डायरेक्ट (दिखाई देने वाला) टैक्स 

 प्रत्यक्ष कर जैसे आयकर यानी इनकम टैक्स, जो आपकी कमाई से सीधे सरकारी खजाने में जाता है। इसके लेने के सरकार के कई तरीके होते है- जैसे सैलरी से कटता है, बैंक ब्याज के रूप में, किराया इत्यादि 

आसान भाषा में समझते है :-

ये वो Tax होते हैं जो Government आपकी कमाई के हिस्से के रूप में सीधे आपसे वसूल लेती हैं। जैसे Income Tax, Propery Tax, Corporate Tax, Capital Gain Tax आदि । इन्हें प्रत्यक्ष कर यानी Direct Taxes इसलिए कहते हैं क्योंकि इन्हें जिस व्यक्ति पर लगाया जाता है, Direct उसी से वसूला भी जाता है। इन्हें भरने वाला आगे चलकर किसी और पर उसका भार Transfer नहीं कर सकता। आर्थिक भाषा में कहें तो कराघात (Impact of Tax) और करापात Incident of Tax दोनों समान व्यक्ति पर होता है। इनकम टैक्स और कॉरपोरेट टैक्स ऐसे ही टैक्स हैं।


इनडायरेक्ट (दिखाई न देने वाला) टैक्स 
 टैक्स का यह प्रकार बिजनेस करने वालों के लिए होता है। इसमें GST, सेल्स टैक्स, VAT, एक्साइज ड्यूटी इत्यादि शामिल होते है। यह टैक्स का ऐसा प्रकार है जिसे भारत का हर नागरिक प्रदान करता है, बस रूप अलग – अलग होता है। इसे इस तरह भी समझा जा सकता है कि जब हम बाजार में कुछ खरीदने जाते है तो जो मूल्य हम सामान का देते है उसमे टैक्स का भी हिस्सा लगा होता है। इस तरह हर भारतीय नागरिक इस प्रकार के टैक्स को देता है।

आसान भाषा में समझते है :-

ये वो Tax होते हैं जिन्हें सरकार आपसे अप्रत्यक्ष तौर पर (Indirectly) वसूल करती है। मतलब यह कि Government ने किसी और से लिया, फिर उस देने वाले ने आगे चलकर किसी और से टैक्स की भरपाई कर ली। इनडायरेक्ट टैक्स वस्तुओं और सेवाओं की कीमत में शामिल करके वसूले जाते हैं। Excise Duty, Service Tax, Intertainment Tax आदि इसी Catagory के Tax हैं। हाल ही में आया GST भी इसी Catagory का Tax है। आ र्थिक भाषा में कहें  Indirect Taxes में कराघात (Impact of Tax) और करापात (Incident of Tax)  दोनों अलग-अलग व्यक्ति पर होता है।

Note: Direct और Indirect टैक्सों के बीच अंतर को समझने के लिए स्थितियों को  थोड़ा उलटकर देखते हैं। इनकम टैक्स, Direct Tax टैक्स है और सर्विस टैक्स,  Indirect Tax है। इनकम टैक्स भी आप ही अदा करते है और स र्विस टैक्स भी आखिरकार आप की जेब से ही जाता है। Income Tax आपने कितना दिया, इसका हिसाब-किताब आपको खुद ही Government को देना पडता है।


इससे अलग Service Tax का हिसाब-किताब आप सरकार को नहीं देते। इसका हिसाब-किताब उस सर्विस देने वाले को देना पडता है,। ध्यान दीजिए, दोनों जगह पैसा आखिरकार आपका ही गया है।। Income Tax में गड़बड़ी हुई तो कार्रवाई डायरेक्ट आप पर होगी। Service Tax में ग़ड़बड़ी हुई तो उसे देने वाले यानी दुकानदार पर कार्रवाई होगी। इस तरह Government और आपके बीच भुगतान की जिम्मेदारी में ये अंतर Indirect Tax को, Direct Tax से अलग करता है।

प्रमुख प्रत्यक्ष कर| Major Direct Taxes


इनकम टैक्स | Income tax

जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है कि यह लोगों की Income पर लगाया जाता है। लोग जो भी कमाते हैं, उसमें से एक तय हिस्सा सरकार उनसे Tax के रूप में ले लेती है। इसे Central Government की ओर से लगाया और वसूला जाता है, लेकिन Finance Commision की सिफारिशों के अनुसार केंद्र और State Government के बीच बांटा जाता है । भारत में, बहुत कम Income वाले लोगों को Income Tax के दायरे से बाहर रखा गया है। इसके ऊपर थोड़ा  ज्यादा Income वालों से कुछ Percentage में और बहुत ज्यादा income  वालों से ज्यादा Percentage में इनकम टैक्स लिया जाता है।
किस Level की कमाई होने पर कितना हिस्सा (Percentage में) टैक्स लिया जाएगा, इसकी घोषणा सरकार हर साल Financial Year शुरू होने से पहले Budget में Tax Slab के रूप में करती है। ये Tax Slab भी अलग-अलग श्रेणी के लोगों के लिए अलग-अलग होते हैं। जैसे Senior Citizens, Super Senior Citizens, Companies, Firms, Organisations आदि के लिए अलग-अलग Tax Slab Rates होते हैं।

मुख्य बिन्दु 


  1. Income Tax की गणना के पहले आपकी कई प्रकार की Incomes पर छूटों (पूरी तरह टैक्स मुक्त) और कटौतियों (कमाई के तय हिस्से पर छूट) का फायदा मिलता है।
  2. एक सीमा से ज्यादा कमाई होने पर 10-15% का सरचार्ज भी लगाया जाता है।
  3. आप पर जितना भी Tax बन रहा है उस पर Tax की मात्रा का 3 प्रतिशत Educational Cess सेस भी लगाया जाता है। Education Cess सभी Taxpayers पर बराबर लगता है, भले ही वह किसी भी टैक्स स्लैब में आते हों।
टीडीएस | Tax Deduction at Source-TDS
Income Tax उन स्थितियों में आपको देना होता है, जिनमें पहले से Income तय नहीं होती। आपको एक निश्चित अंतराल (हर तिमाही) में हुई  अपनी Income के अनुसार Tax जमा करना पड़ता है। Income के कुछ तरीके ऐसे होते हैं, जिनमें Payment पहले से तय होता है, जैसे सैलरी, Contract Payment आदि। ऐसे मामलों में सरकार Salary देने वाले या Contract Payment करने वाले को ही Payment से पहले ही टैक्स काटकर जमा करने का जिम्मा सौंपती है। इस प्रक्रिया में चूंकि आमदनी देने वाले स्रोत से ही टैक्स कटौती कर ली जाती है, इसलिए इसे स्रोत पर कर कटौती Tax Deduction at Source या टीडीएस कहा जाता है।
For Example: अगर आप किसी संस्थान के Salaried कर्मचारी हैं और आपकी सैलरी टैक्सेबल है तो कंपनी तनख्वाह देने से पहले TDS काट लेती है। बचा हिस्सा ही आपके Account में जमा करती है। TDS काटने वाला इसका Certificate भी देता है।

सुविधाओं पर टैक्स | Perquisite Tax
Employer की ओर से अपने  Staff को Salary के अलावा दी जाने वाले पर्क्स (अतिरिक्त सुविधाओं) पर Perquisite Tax लगता है। उदाहरण के लिए, आपकी कंपनी आपको Salary के अलावा जो कार-ड्राइवर, आवास, क्लब मेंबरशिप, Employee stock ownership plan-ESOP आदि की सुविधाएं देती है उन पर Perquisite Tax देना पडता है। इस Tax के अंतर्गत यह देखा जाता है कि क्या Company द्वारा दी गई सुविधा का वास्तविक फायदा Staff को हो रहा है कि नहीें।
For Example:  अगर आपको Company सिर्फ कंपनी के Business संबंधी कार्यों के लिए कार उपलब्ध कराती है तो उस पर आपको Tax नहीं देना होगा। इसके विपरीत, अगर वही Car आपको घर से आने-जाने और अन्य निजी कार्यों के लिए भी उपलब्ध कराई जाती है तो इस पर इस पर होने वाले खर्च पर Perquisite Tax लगेगा। अगर दोनों तरह के कामों में यही Car लगाई जाती है तो भी यह Tax लगेगा।

कैपिटल गेन्स टैक्स| Capital Gains tax
Property, Gold, Jwellery, Shares  और B0nds  वगैरह को बेचने से होने वाले लाभ को Capital Gain कहा जाता है। सरकार Capital Gain पर भी टैक्स लेती है। Capital Gain दो प्रकार के होते हैं-long Term Capital Gain और Short Term Capital Gain।  हर पूंजी पर Long Term और Short Term की गणना और उस पर Tax का Rate अलग-अलग होता है

मुख्य बिन्दु 

  1. Real Estate यानी घर, दुकान, Office आदि को खरीदने के दो साल बाद बेचा जाता है तो इस पर मिलने वाले लाभ को long Term Capital Gain कहा जाता है। इन्हें  खरीदने के दो साल के अंदर बेचा जाता है तो उस पर मिलने वाले लाभ को Short Term Capital Gain कहा जाता है।
  2. Gold, Jwellery, सिक्के आदि  के लिए लॉन्ग टर्म तीन साल का होता है।
  3. शेयर मार्केट में Stocks और Mutual Funds की खरीद-बिक्री के संबंध में 1 साल के उपर की अवधि को Long Term कहा जाता है, जबकि 1 साल से कम की अवधि को Short Term की श्रेणी में रखते हैं।

कॉर्पोरेट टैक्स | Corporate Tax
कोई कंपनी यदि भारत में कारोबार करती है तो उस पर Corporate Tax लगाया जाता है। दरअसल जिस तरह हम लोगों की कमाई पर इनकम टैक्स लगता है उसी तरह कंपनियों की कमाई पर कॉरपोरेट टैक्स लगता है।

मुख्य बिन्दु :
  1. कॉर्पोरेट टैक्स में किसी तरह की छूट नहीं होती है और इसका फ्लैट रेट 25% है।  50 करोड़ रुपए से अधिक का सालाना कारोबार करने वाली घरेलू कंपनियों पर यह 30 प्रतिशत है।
  2. विदेशी कंपनियों पर 40 प्रतिशत Corporate Tax लगता है। हालांकि यह उस देश के साथ Trade संधियों पर भी निर्भर करता है। घरेलू और विदेशी दोनों Categories की कंप​नियों पर एक करोड़ से अधिक का सालाना Turn Over होने पर Surcharge भी लगता है।
  3. इसके अलावा जितना भी Tax व Surcharge का टोटल बन रहा है, उसका 3 प्रतिशत एजुकेशन सेस लगता है, भले ही कंपनी का Turn Over कितना ही कम-ज्यादा हो।
प्रमुख अप्रत्यक्ष कर| Major Indirect Taxes

जीएसटी | Goods And Services Taxes-GST 
GST यानी माल एवं सेवा कर देश भर में 1 जुलाई 2017 से लागू हुआ है। इसे इसके पहले केंद्र और राज्य सरकारों की ओर से लागू तीन दर्जन से ज्यादा Indirect Taxes को हटाकर लागू किया गया है। मतलब यह कि वस्तुओं और सेवाओं पर अब पहले लगने वाले ढेरों Taxes  की बजाय अब अकेला GST टैक्स लगना है। GST में जो टैक्स मिलाए गए हैं, उनमें से प्रमुख Taxes के नाम हम नीचे सारणी में दे रहे हैं।

  1. केंद्रीय उत्पाद शुल्क Central Excise Duty
  2. Duties of Excise (Medical and Toilet Preparations)
  3. विशेष महत्व वाली वस्तुओं पर अतिरिक्त केंद्रीय उत्पाद शुल्क Additional Duties of Excise
  4. वस्त्र एवं वस्त्र उत्पादो पर अतिरिक्त केंद्रीय उत्पाद शुल्क  Additional Duties of Excise (Textiles and textile products)
  5. कस्टम शुल्क Duties of Customs (CVD)
  6. Special Additional Duty of Customs (SAD)
  7. सर्विस टैक्स उपकर एवं अधिभार Service Tax Cesses and surcharges
  8. प्रादेशिक कर State VAT
  9. केंद्रीय विक्री कर Central Sales Tax
  10. क्रय कर Purchase Tax
  11. विलासिता कर Luxury Tax
  12. प्रवेश कर Entry Tax (all forms)
  13. मनोरंजन कर Entertainment Tax (स्थानीय निकाय से अलग)
  14. विज्ञापन कर Taxes On Advertisements
  15. लॉटरी, सट्टा, जुएं आदि पर टैक्स Taxes on lotteries, Betting and Gambling
  16. प्रादेशिक उपकर एवं अधिभार State cesses and surcharges

कहने को तो जीएसटी एक टैक्स है, लेकिन इसको तीन रूपों में लगाया गया है।
CGST यानी केंद्रीय वस्तु एवं सेवा कर| Central Goods And Services Tax
किसी राज्य के अंदर, उसी राज्य के दो पक्षों के बीच सौदा होने पर केंद्र सरकार की ओर से CGST यानी केंद्रीय वस्तु एवं सेवा कर वसूला जाएगा। Tax का यह Amount केंद्र सरकार को मिलेगा।

SGST यानी प्रादेशिक वस्तु एवं सेवा कर| State Goods And Services Tax

किसी राज्य के अंदर, उसी राज्य के दो पक्षों के बीच सौदा होने पर वहां की राज्य सरकार की ओर से SGST यानी प्रादेशिक वस्तु एवं सेवा कर वसूला जाएगा। Tax  का यह Amount राज्य सरकार को मिलेगा।

IGST यानी एकीकृत प्रादेशिक वस्तु एवं सेवा कर | Integrated Goods And Services Tax

दो अलग-अलग राज्यों के दो पक्षों के बीच सौदा होने पर केंद्र सरकार की ओर से IGST यानी एकीकृत प्रादेशिक वस्तु एवं सेवा कर वसूला जाएगा। Tax का यह Amount आगे चलकर केंद्र और राज्य सरकार बीच बंट जाएगा।

जीएसटी की पांच अलग-अलग दरें| Five Different Rates Of GST
सामान्य जीवन के लिए Utility और Importance  के आधार पर वस्तुओं और सेवाओं पर GST की अलग—अलग दरें निर्धारित की गई हैं। ये हैं zero, 5%, 12%, 18% and 28%। अति आवश्यक वस्तुओं (जैसे कि अनाज, दूध और और ताजी सब्जियां) पर Zero प्रतिशत, आवश्यक वस्तुओं पर 5 प्रतिशत, सामान्य वस्तुओं पर 12 प्रतिशत, इसके बािद कम जरूरी और विलासी वस्तुओं (जैसे कि Air Conditioner, Refrigerator, Makeup आदि) पर 18 प्रतिशत या 28 प्रतिशत GST लगाकर इसे जनता के लिए ज्यादा उपयोगी बनाने की कोशिश की गई है। होटल (खाने या ठहरने के लिए) की GST रेटिंग के आधार पर तये की जाती है उदाहरण के तौर पर आप NON-AC HOTEL का इस्तेमाल करते है तो  जीएसटी दर 18 प्रतिसत्त है और अगर AC HOTEL इस्तेमाल करते है तो GST दर 28 प्रतिसत्त है।  
GST के रेट तय करने के लिए GST Council बनाई गई है। इसके अध्यक्ष केंद्रीय Finance Minister होंगे और राज्यों के Finance Ministers इसके सदस्य होंगे। केंद्र के पास किसी निर्णय पर Vote देने की एक तिहाई शक्ति होगी, और दो तिहाई शक्ति राज्य सरकारों के पास होगी। किसी भी फैसले को मंजूरी मिलने के लिए उसे Council के तीन चौथाई Votes की जरूरत होगी।

मुख्यतः हमने आपको सभी टैक्स के बारे में बता दिया है इसके अलावा और भी अन्य प्रकार के डायरेक्ट टैक्स सरकार लेती जैसे गिफ्ट टैक्स, वेल्थ टैक्स इत्यादि। 



टैक्स समझ लिया अब समझिये सरकार कहाँ से पैसे कमाती है, कहाँ खर्च करती है और कहाँ गवाती है।

बजट :

अब यह बजट कहाँ से टपक पड़ा?
आप जानते ही होंगे कि बजट हर साल पेश किया जाता है. बजट सरकार का लेखा जोखा होता है . जैसे आपके parents घर का budget बनाते होंगे कि इस महीने या इस साल कितना खर्च करना है, कितना खर्च हुआ और कितने उधार लेने पड़े, उसी तरह सरकार भी अपना लेखा-जोखा बनाती है कि इस साल कौन से क्षेत्र ( रक्षा, विदेश, अन्य मंत्रालय) पर कितना खर्च करना है और यह भी देखती है कि पिछले साल हम कितने घाटे में रहें, बाहर के देशों से कितना उधार लेना पड़ा, उन्हें कितना लौटाना है, किसको हमने क्या दिया था और क्या, कितना वापस लेना है इत्यादि.

हर साल सरकार देश के वित्त मंत्री अपने बजट में आयकर के स्लैब के बारे में बात करते है। कभी यह स्लैब बढ़ा दिया जाता है तो कभी घटा दिया जाता है। एक बात यह ध्यान देने वाली है कि भारत में रहने वाला हर व्यक्ति भारत सरकार को टैक्स देता है। टैक्स देने का तरीका अलग होता है। जो बिजनेस करते है वह अपना अलग से टैक्स रिटर्न फाइल करते है, जो नौकरी में होते है उनके सैलरी से टैक्स की रकम कट जाती है।

अब आपको आगे की बात समझने में आसानी हो इसलिए एक महत्वपूर्ण बात आपको जाननी पड़ेगी कि जो पैसा हमें मिल रहा है यानी लाभ हो रहा है उसे हम (Revenue) कहेंगे और जो पैसा हमारे हाथ से बाहर जा रहा है उसे हम (Expenditure) कहेंग अर्थात्

Incoming money = Revenue और Outgoing money= Expenditure

पर सवाल उठता है कि देश को पैसे कहाँ से मिलते हैं? Revenue का source क्या है?

हम एक रुपये को आधार मान कर चलते है जो की सरकार की कुल आमदनी होगी और वो सरकार कहाँ से इकट्ठा करती है उसका आकलन हम पैसो में करेंगे। 

Revenue Source | कहाँ से पैसे सरकार लाती है 
  1. Borrowing & Other Liabilities :- 20 Paisa 
  2. Corporation Tax :- 18 Paisa
  3. Income Tax :- 17 Paise 
  4. Customs Tax :- 4 Paise 
  5. Union Excise Duty Tax :- 7 Paise
  6. GST :- 18 Paise 
  7. Non Tax Revenue : - 10 Paise
  8. Non-Debt Capital Receipts :- 6 Paise 
Total Revenue Source  :-  (20+18+17+4+7+18+10+6 = 100 Piase = 1 Rupee )

Expenditure कहाँ कितना सरकार खर्च करती है 
  1. Pension :- 6 Paise
  2. Subsidies :- 6 Paise
  3. Defence :- 8 Paise
  4. Centrally Sponsered Scheme :- 9 Paise
  5. Finance Commission & Other Transfers :- 10 Paise
  6. Central Sector Scheme : -13 Paise 
  7. Interest Payments : - 18 Paise 
  8. State Share Of Taxes And Other Duties : - 20 Paise 
  9. Other Expenditure : - 10 Paise 
Total Expenditure :- ( 6+6+8+9+10+13+18+20+10 = 100 Paise = 1 Rupee )

 राजकोषीय घटा 

जब outgoing money ज्यादा हो Incoming Money से तो उसे  घाटे का बजट/Deficit Budget कहेंगे। जब Outgoing money कम हो Incoming Money से तो उसे अतिरिक्त बजट/Surplus Budget कहेंगे। जब Outgoing money बराबर हो Incoming Money से तो उसे  संतुलित बजट/Balanced Budget कहेंगे। 

पर यह भी ध्यान देने योग्य बात है कि गवर्नमेंट हमेशा Deficit Budget Face करती  है. पर क्यों ?.....

क्योंकि हमें सेना/टैंक्स/मिसाइलों पर खर्च करना पड़ता है.बेरोजगारी, गरीबी, किसान भाइयों के लिए हमेशा कोई न कोई स्कीम लानी ही होती है नहीं तो बजट में तत्कालीन गवर्नमेंट की थू-थू होगी.

इन अनेक कारणों से सरकार चादर के नाप से ज्यादा पैर फैला लेती है, जिसके फल स्वरुप क्या स्थिति आ जाती है?

Expenditure>Revenue=Fiscal Deficit/Revenue/Budget or Primary deficit आसान शब्दों में जिसको राजकोषीय घाटा कहते है। 

अब थोड़ा समझते है की राजकोषीय घाटा होता क्या है और इसे निकालने का तरीका क्या है :-

हम सरकार की प्राप्तियां और खर्च पर राजकोषीय घाटा निकालेंगे।
सरकार की प्राप्तियां 2  प्रकार  से होती है :-
1. Revenue  Receipts ( राजस्व प्राप्ति ) :- 20 लाख 20 हजार 926 करोड़
1.1 Tax Revenue (कर राजस्व) : - 16 लाख 35 हजार 909 करोड़
1.2 Non Tax Revenue (गैर कर राजस्व) :- 3 लाख 85 हजार 17 करोड़

Revenue  Receipts ( राजस्व प्राप्ति ) = Tax Revenue (कर राजस्व) : 16 लाख 35 हजार 909 करोड़ + Non Tax Revenue (गैर कर राजस्व) : 3 लाख 85 हजार 17 करोड़ = 20 लाख 20 हजार 926 करोड़
2.Capital Receipts ( पूंजीगत प्राप्ति ) :- 10 लाख 21 हजार 904 
Total Expenditure ( खर्च ) :- 30 लाख 42 हजार 230 करोड़

रेवेन्यू रेसिप्टस ( राजस्व प्राप्ति ) (Tax & Non Tax Revenue)  
20 लाख 20 हजार 926 करोड़ है, रेवेन्यू रेसिप्टस का मतलब होता है सरकार द्वारा वसूले गए सभी प्रकार के कर और शुल्क, निवेशों पर प्राप्त ब्याज और लाभांश तथा विभिन्न सेवाओं के बदले प्राप्त रकम. आसान शब्दों में समझे तो सरकार जो अलग-अलग प्रकार के टैक्स हम से लेती है उसी को रेवेन्यू रेसिप्टस( राजस्व प्राप्ति )  कहते है.

Tax Revenue (कर राजस्व) 
कोई सरकार टैक्स लगा कर जो रेवेन्यू हासिल करती है, उसे टैक्स रेवेन्यू कहा जाता है। सरकार विभिन्न प्रकार के टैक्स लगाती है, ताकि वह योजनागत और गैरयोजनागत व्यय के लिए धन एकत्र कर सके।

Non Tax Revenue (गैर कर राजस्व) 

नॉन टैक्स रेवेन्यू वह राशि है जो सरकार टैक्स के अतिरिक्त अन्य साधनों से एकत्र करती है। इसमें सरकारी कंपनियों के विनिवेश से मिली राशि, सरकारी कंपनियों से मिले लाभांश और सरकार द्वारा चलाई जाने वाली विभिन्न आर्थिक सेवाओं के बदले मिली राशि शामिल होती है।

कैपिटल रेसिप्टस ( पूंजीगत प्राप्ति ) 
10 लाख 21 हजार 904 करोड़ है, सरकार द्वारा बाजार से लिए गए ऋण, भारतीय रिजर्व बैंक से ली गई उधारी, शेयर बेच कर, वर्ल्ड बैंक से उधारी और विनिवेश के जरिए प्राप्त आमदनी को कैपिटल रेसिप्टस( पूंजीगत प्राप्ति ) कहते है. 

सरकार की खर्च भी  2  प्रकार  से होती है :-
  1. Revenue Expenditure ( राजस्व व्यय ) :- 26 लाख 30 हजार 145.16 करोड़ 
  2. Capital Expenditure ( पूंजीगत व्यय ) :- 10 लाख 84 हजार 748.31 करोड़ 
Revenue Expenditure ( राजस्व व्यय ) 
रेवेन्यू एक्सपेंडीचर सरकार के रोजमर्रा के खर्च हैं जैसे कर्मचारियों की सैलरी, पेंशन, मेंटीनेंस वगैरा-वगैरा। ये ग्रोथ के साथ साथ बढ़ते हैं लेकिन इनसे कोई फायदा नहीं होता है।

Capital Expenditure ( पूंजीगत व्यय )

जब आप कार खरीदते हैं तो ये कैपिटल एक्सपेंडीचर होता है जिसका फायदा आपको लांग टर्म में मिलता है लेकिन उसमें पेट्रोल भराना रेवेन्यू एक्सपेंडीचर है। जो कार में कोई वैल्यू नहीं जोड़ती। इसी प्रकार सरकार भी जमीन खरीदती है, बिल्डिंग बनाती है, मशीनें लगती है और इस तरह एसेट बनाने पर खर्च करती है, जिसका इस्तेमाल हम आप करते हैं। इससे न सिर्फ ऐसेट तैयार होता है बल्कि बड़े पैमाने पर रोजगार के मौके बनते हैं ये खर्च ग्रोथ के लिए बेहद जरूरी हैं इसे ही हम कैपिटल एक्सपेंडीचर कहते हैं।

टोटल एक्सपेंडिचर : 20 लाख 20 हजार 926 करोड़ +  10 लाख 21 हजार 904 करोड़ =  30 लाख 42 हजार 230 करोड़ है


अब आपके मन में उथल पुथल मची होगी की भाई हमको ये क्यूँ समझा रहे है, हमको तो ये जानना है की राजकोषीय घाटा क्या होता है और सरकार क्यूँ सरकारी कंपनियों को बेच रही है.


आपने सरकार के कमाई और खर्च के बारे में जान लिया, अब हम सरकार के घाटो के बारे में जानते है.

  1. Revenue Deficit ( राजस्व घाटा ) :- 6 लाख 09 हजार 219 करोड़ 
  2. Fiscal Deficit ( राजकोषीय घाटा ) :- 7 लाख 96 हजार 337 करोड़ 
  3. Effective Revenue Deficit ( प्रभावी राजस्व घाटा ) :- 4 लाख 02 हजार 719 करोड़ 
  4. Primary  Deficit  ( प्राथमिक घाटा ) :- 0 लाख 88 हजार 134 करोड़ 
Revenue Deficit (राजस्व घाटा) : राजस्व घाटे का मतलब सरकार की अनुमानित राजस्व प्राप्ति और व्यय में अंतर होता है। किसी वित्त वर्ष के लिए सरकार राजस्व प्राप्ति और अपने खर्च का एक अनुमान लगाती है। लेकिन जब उसका व्यय उसके अनुमान से बढ़ जाता है, तो इसे राजस्व घाटा कहा जाता है।
नहीं समझ आया चलिये आपको एक उदहारण से समझाते है, मान लीजिये सरकार ने अनुमान लगाया कि इस वित्त वर्ष में करों और दूसरे माध्यमों से उसकी कुल राजस्व प्राप्ति 120 रुपए रहेगी और इस दौरान सरकार का खर्च 90 रुपए रहेगा। इस तरह से अनुमान के मुताबिक सरकार को 30 रुपए शुद्ध राजस्व प्राप्त होगा। लेकिन यदि उस वित्त वर्ष के दौरान सरकार की कुल राजस्व प्राप्ति 110 रुपए रही और उसका खर्च 85 रुपए रहा, तो इस स्थिति में शुद्ध राजस्व 25 रुपए रहेगा, जो अनुमान से पांच रुपए कम है। पांच रुपए की यह कमी ही राजस्व घाटा कहलाएगी।


Revenue Deficit ( राजस्व घाटा )  = Revenue Expenditure ( राजस्व व्यय ) - Revenue  Receipts ( राजस्व प्राप्ति )  


Revenue Deficit ( राजस्व घाटा ) = Revenue Expenditure ( राजस्व व्यय ) : 26 लाख 30 हजार 145.16 करोड़ - Revenue  Receipts ( राजस्व प्राप्ति ) : 20 लाख 20 हजार 926 करोड़ = 6 लाख 09 हजार 219 करोड़ 


अगर सरकार की राजस्व प्राप्ति अनुमान के मुकाबले बढ़ जाती है, तो उसे रेवेन्यू सरप्लस कहा जाता है। सरकार कई सारी योजनाएं चलाती रहती है, जिनमें काफी धन खर्च होता है, इसके कारण राजस्व घाटा बढ़ता है। इसके साथ ही कर और दूसरे माध्यमों से सरकार को प्राप्त होने वाले राजस्व में कमी होने से भी राजस्व घाटा बढ़ जाता है। अगर राजस्व घाटा एक हद से आगे बढ़ जाता है, तो वह सरकार के लिए चिंता का कारण बन जाता है।


Fiscal Deficit ( राजकोषीय घाटा )

वित्तीय घाटा बताता है कि किसी वित्त वर्ष के दौरान सरकार की कुल आमदनी (उधार को छोड़ कर) और कुल खर्च का अंतर कितना है। वित्तीय घाटे के बढ़ने का मतलब है कि सरकार की उधारी बढ़ेगी। यहां ये भी समझना जरूरी है कि अगर उधारी बढ़ेगी तो ब्याज की अदायगी भी बढ़ेगी। ब्याज का बोझ बढ़ने से सरकार के राजस्व घाटे पर नकारात्मक असर पड़ेगा। और एक तरह से सरकार कर्ज के जाल में फंसती जाएगी। वित्तीय घाटे के बढ़ने के एक मतलब ये है कि सरकार को ज्यादा उधार की जरूरत होगी, जिसकी वजह से ब्याज दरें भी बढ़ सकती हैं। वित्तीय घाटे की भरपाई के लिए सरकार आरबीआई से उधार लेती है जिसकी वजह से आरबीआई को ज्यादा करेंसी नोट छापने पड़ सकते हैं और ये महंगाई को बढ़ा सकता है। वित्तीय घाटे में बढ़ोत्तरी विकास दर पर नकारात्मक असर डालती है और निवेश के माहौल को खराब करती है।

Fiscal Deficit ( राजकोषीय घाटा ) =  Total Expenditure ( खर्च )  -  Revenue  Receipts ( राजस्व प्राप्ति ) - Capital Receipts ( पूंजीगत प्राप्ति ) उधारी को छोड़कर (Including Load Recoveries & Other Receipts And excluding Borrowings & Other Liabilities ) 


Fiscal Deficit ( राजकोषीय घाटा ) = Total Expenditure ( खर्च ) : 30 लाख 42 हजार 230 करोड़ -  Revenue  Receipts ( राजस्व प्राप्ति ) : 20 लाख 20 हजार 926 करोड़ - Capital Receipts ( पूंजीगत प्राप्ति ) उधारी को छोड़कर 2 लाख 25 हजार 567 करोड़  = 7 लाख 96 हजार 337 करोड़ 



Effective Revenue Deficit ( प्रभावी राजस्व घाटा ) :- 
इसे संघिये बजट 2011 - 2012 द्वारा पहली बार इस्तेमाल किया गया था। 

Revenue Deficit राजस्व घाटा ) घाटे सरकार के वो व्यय भी शामिल होते है जो केंद्र सरकार, राज्य सरकारों को अनुदान के रूप में देते थे लेकिन 2011 में तर्क रखा गया की केंद्र सरकार के Revenue Expenditure ( राजस्व व्यय ) में से उन खर्चो को घटा कर देखा जाना चाहिए जो सरकार राज्यों को अनुदान के रूप में देता है।  

अब आप सोच में पर गए होंगे की ये भारी-भरकम शब्द अनुदान क्या होता है, आपको बता दे की अनुदान कुछ और नहीं बल्कि केंद्र सरकार  द्वारा, राज्य सरकार को दी जाने वाली मदद है, एक सरकारी अनुदान किसी प्रकार के लाभकारी योजनाओ के लिए राज्य को केंद्र सरकार  द्वारा दिया जाने वाला वित्तीय पुरस्कार होता है. इसके अलावा जब राज्यों में प्रकृतिक आपदा आती है तब  सरकार  द्वारा अनुदान दिया जाता है जिसको हम अंग्रेजी में Grant कहते है। अब सरकार का जो अपना घाटा है वो इन अनुदानों के साथ आता था जबकी ये खर्च राज्यों में होते थे इसलिए इस घाटे को लाया गया 


Effective Revenue Deficit ( प्रभावी राजस्व घाटा ) = Revenue Deficit  ( राजस्व घाटा )- Grants For Creation Of Capital Assets (पूंजीगत परिसंपत्तियों के निर्माण के लिए अनुदान जैसे प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजन,त्वरित सिंचाई लाभ कार्य, योजनाओ के लिए अनुदान, आपदा में मदद तथा इत्यादि। 

Effective Revenue Deficit ( प्रभावी राजस्व घाटा ) = 6 लाख 09 हजार 219 करोड़ - 2 लाख 6 हजार 5 सौ करोड़ = 4 लाख 2 हजार 719 करोड़ 


Primary  Deficit  ( प्राथमिक घाटा ) 

देश के वित्तीय घाटे और ब्याज की अदायगी के अंतर को प्राथमिक घाटा कहते हैं। प्राथमिक घाटे के आंकड़े से इस बात का पता चलता है कि किसी भी सरकार के लिए ब्याज अदायगी कितनी बड़ी या छोटी समस्या है। भारत में ब्याज की अदायगी एक बड़ा खर्च है। भारत में 100 रुपए में से 18 रूपए सरकार के उधार पर ब्याज की अदायगी में जाते हैं।

Primary  Deficit  ( प्राथमिक घाटा )  = Fiscal Deficit ( राजकोषीय घाटा ) - Interest Payments


Primary  Deficit  ( प्राथमिक घाटा ) = 7 लाख 96 हजार 337 करोड़  - 7 लाख 8 हजार 203 करोड़ = 88 हजार 134 करोड़ 



फिर इस घाटे की स्थिति में सरकार क्या-क्या कर सकती है?

1.विदेश से उधार ले ले/अंतरराष्ट्रीय ऋण–world bank

2.खुद नोट प्रिंट करने लगे…लाखों हजारों के नोट छाप ले, सरकार राजकोषीय घाटे का वह हिस्सा जो नोट छाप कर पूरा करती है, वही अंग्रेजी में monetized deficit या ‘मौद्रिक घाटा’ कहलाता है।
3.कोई policy create करे जिससे return या tax collection अच्छा आए , कोई LIC scheme, FDI in different sectors?
4.अपने उन सरकारी कंपनियों का शेयर को बेच दे जो मुनाफा नहीं  दे रही हो और साल  दर साल उनपर पैसा लगाना घाटे  सौदा हो रहा हो। 

World bank से उधार तो सरकार ले लेगी पर उसे चुकाना भी पड़ेगा. इसीलिए यह मात्र तत्कालीन विपरीत परिस्थितियों से बचने का तरीका है, long-term solution नहीं. हाँ, यदि उधार लिया हुआ पैसा सरकार सही योजनाओं पर खर्च करे जिससे return कई गुना अधिक मिले, जैसे — irrigation, new high-breed seeds, new canal etc पर खर्च करे तो return भी हमें अच्छा मिलेगा, तब जाकर हम वर्ल्ड बैंक को पैसा तो लौटायेंगे ही, साथ-साथ मुनाफे में भी रहेंगे.



सरकार क्यों नहीं खुद खूब सारा नोट छाप लेती है :
खुद नोट प्रिंट करना तो सबसे बड़ी बेवकूफी होगी. मान लीजिए, गरीबी को दूर करने के लिए RBI को 10 लाख रु. नोट छापने का आर्डर दिया गया. फिर क्या होगा? सब गरीबों के पास अच्छी-खासी रकम आ जाती है. सब अब सूखी रोटी छोड़कर ब्रेड, मक्खन, आइसक्रीम, फाइव स्टार होटल में जा कर खाने लगे. Supply of goods तो लगभग same ही रहेगी मगर demand बढ़ता जाएगा.Economy’s basic rule:– जब माँग बढ़ेगी, दाम भी बढ़ेगा.अब Rs. 1000 किलो आलू मिलेगा क्योंकि अब सब अमीर हो चुके हैं.Inflation enters into economy that is not healthy. वेनेजुएला में हाल के वर्षों में नोट छापने के चलते ही 1000 गुना इन्फ्लेशन बढ़ गया था.The Financial Times quoted:–“Venezuela’s inflation woes are being further compounded by the central bank’s massive money printing operation which has sent the value of the bolivar plummeting.”इसीलिए fiscal deficit/ राजकोषीय घाटा से बचने का अच्छा तरीका (that is called fiscal consolidation) यही है कि हम


  1. सब्सिडी (पेट्रोल, डीजल, गैस)  को कम करें.
  2. टैक्स स्ट्रक्चर में सुधार लायें (GST लाकर)
  3. जंग खाए हुए सरकारी कारखानों को आधुनिक व productive बनायें
  4. ब्लैक मनी वापस लायें.
  5. मंत्रियों की सुख-सुविधाओं पर कटौती करें.
  6. FDI पर काम करें, नए स्कीम लांच करें जिससे टैक्स कलेक्शन जम कर हो सके.
सरकार अपनी कंपनियां क्यों बेचती है? 

सरकार ने ये क़दम साल 2020- 21 में अपने विनिवेश लक्ष्य 2.11 लाख करोड़ को ध्यान में रखते हुए उठाया है. कुछ विश्लेषक इसे सरकार का साहसी क़दम बता रहे हैं. लेकिन एलआईसी के कर्मचारी सरकार के इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ हैं. इस मुद्दे पर कर्मचारियों ने अपना विरोध जताया.हमने पहले भी देखा था जब एयर इंडिया को भी बेचने की बात उठी थी तब भी कंपनियों के कर्मचारियों के तरफ से नाराजगी देखने को मिली थी। 

इस नीति के इतिहास में देखें तो ब्रिटेन की पूर्व प्रधानमंत्री मार्गरेट थेचर को भी अपनी विनिवेश नीति को लेकर विरोध का सामना करना पड़ा था. लेकिन जानकारों की मानें तो थेचर के उस फ़ैसले ने ही ब्रितानी अर्थव्यवस्था को भारी नुक़सान से बचाया था.
क्या कहता है बिता वक़्त :
भारत सरकार और डिसइन्वेस्टमेंट यानी सरकारी कंपनियों में हिस्सेदारी बेचने की कहानी बहुत पुराणी है. दिखने में आसान लगती है मगर खोलते चलो तो पर्त दर पर्त पेंच पर पेंच निकलते चलते हैं. एक सवाल का जवाब देंगे तो तीन नए सवाल खड़े होंगे. तो बात शुरू से ही शुरू करनी पड़ेगी.

1991 में जब भारत में आर्थिक सुधार हुए तब ये बात मान तो ली गई कि सरकार का काम बिजनेस करना नहीं है.लेकिन ये बात न सरकार में बैठे लोगों को ही ठीक से हजम हुई और न वो इस देश को यकीन दिला सके कि ऐसा करना ही देश के हित में है.फिर उन्हें ये समझने में भी बहुत मुश्किल हुई कि किस काम को बिजनेस माना जाए और किसे राष्ट्रहित. यानी एयर इंडिया, बीएसएनएल, एचएएल और एचपीसीएल, बीपीसीएल को प्राइवेट हाथों में कैसे दे दिया जाए?

यहां ये याद करना भी ज़रूरी है कि 1991 में फ़ैसला होने के बावजूद 2001 तक सरकार इस रास्ते सिर्फ़ 20078 करोड़ रुपए ही जुटा पाई थी, जबकि लक्ष्य था 54 हज़ार करोड़ रुपए का. 1991-92 में 31 कंपनियों में हिस्सा बेचकर क़रीब तीन हज़ार करोड़ रुपए मिले थे, यानी शुरुआत तुरंत हो गई थी. जी वी रामकृष्ण की अध्यक्षता में विनिवेश आयोग भी 1996 तक 13 रिपोर्ट दे चुका था.

उसने 57 कंपनियों में हिस्सेदारी बेचने की सिफ़ारिश की थी. तब भी दस साल में ये लक्ष्य पूरा क्यों नहीं हो पाया? इसके जवाब में मुंबई स्टॉक एक्सचेंज की वेबसाइट पर सात कारण गिनाए गए हैं-

1. बाज़ार की हालत ठीक नहीं.
2. सरकार ने बिक्री का जो प्रस्ताव रखा वो निजी क्षेत्र के निवेशकों के लिए आकर्षक नहीं था.
3. वैल्यूएशन यानी बिक्री के भाव का हिसाब लगाने पर भारी विरोध.
4. हिस्सेदारी बेचने की कोई साफ़ नीति नहीं थी.
5. कर्मचारियों और ट्रेड यूनियनों का जोरदार विरोध.
6. बिक्री के काम में पारदर्शिता का अभाव.
7. राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी.


और इस दौरान जो विनिवेश या हिस्सा बिक्री हुई भी वो ज़्यादातर कंपनियों में छोटी छोटी हिस्सेदारी बेचकर हुई. इन शेयरों की बिक्री से मिलनेवाली रकम भी बहुत कम थी, जबकि इसमें इंडियन ऑयल, बीपीसीएल, एचपीसीएल, गैस ऑथोरिटी और विदेश संचार निगम जैसी ब्लू चिप कंपनियों के शेयर शामिल थे. वजह साफ़ थी, प्राइवेट इन्वेस्टरों को किसी ऐसी कंपनी के शेयर खऱीदने में कोई दिलचस्पी थी नहीं जिसे चलाने का काम बाद में भी सरकार के इशारे पर ही होता रहनेवाला है.इसलिए जो शेयर बिके भी वो ज़्यादातर घरेलू वित्तीय संस्थानों यानी एलआइसी और यूटीआई जैसे संस्थानों ने ही खऱीदे. दाम ज़्यादा नहीं थे इसलिए वक्त के साथ ये निवेश फ़ायदेमंद तो रहा, तो अब आप समझ गए होंगे की कंपनियों को बेचने का सिलसिला कब और किसके शासन में हुआ और कितने गैर जिम्मेदाराना तरीके  से हुआ। 

अभी भारत का राजकोषीय घाटा  7 लाख 96 हजार 337 करोड़  रुपए का है. इसका मतलब ख़र्चा बहुत ज़्यादा और कमाई कम. खर्च और कमाई में  7 लाख 96 हजार 337 करोड़ का अंतर जो हमें ऊपर में पूरे विस्तार से जाना है। 


तो इससे निपटने के लिए सरकार अपनी कंपनियों का निजीकरण और विनिवेश करके पैसे जुटाती है.

निजीकरण और विनिवेश को अक्सर एक साथ इस्तेमाल किया जाता है लेकिन निजीकरण इससे अलग है. निजीकरण में सरकार अपनी कंपनी में 51 फीसदी या उससे ज़्यादा हिस्सा किसी कंपनी को बेचती है जिसके कारण कंपनी का मैनेजमेंट सरकार से हटकर ख़रीदार के पास चला जाता है.विनिवेश में सरकार अपनी कंपनियों के कुछ हिस्से को निजी क्षेत्र या किसी और सरकारी कंपनी को बेचती है.

सरकार तीन तरह से पैसा जुटाने की कोशिश कर रही है -
1. विनिवेश 
2.निजीकरण और
3.सरकारी संपत्तियों की बिक्री.

महत्वपूर्ण कारण जिसके चलते सरकार को कंपनियां बेचनी परती है.
1.एक कारण यह है कि कुछ कंपनियां ऐसी होती हैं जिन्हें निजी क्षेत्र बहुत बेहतर ढंग से चला सकता है और सरकार को इन कंपनियों को चलाने की ज़रूरत नहीं होती है. उदाहरण के लिए, मॉडर्न ब्रेड नाम की एक सरकारी कंपनी हुआ करती थी. लेकिन जब कई अन्य छोटी-बड़ी कंपनियां भी ब्रेड बना रही हैं तो सरकार को ब्रेड बनाने की ज़रूरत नहीं है.

2. दूसरा कारण ये है कि सरकार अपनी संरचना और काम करने के ढंग की वजह से कुछ कंपनियों की हालत ख़राब कर देती है और इसी का नतीजा है की कांग्रेस ने अपने कार्यकाल में एयर इंडिया और LIC की इतनी बुरी हालत कर दी की आज सरकार इसमें पैसा लगा भी रही है तो सरकार को कोई मुनाफा नहीं हो रहा है, चुकीं एलआईसी ने सरकार की हमेशा से बुरे समय में मदद की है फिर सरकार एलआईसी का आईपीओ ला रही इसके बारे में आगे हम विस्तार से बात करेंगे। 

इसका सबसे ताज़ा उदाहरण एयर इंडिया है. जब तक टाटा समूह इस कंपनी को चलाया करता था तब तक इसे विश्व की सर्वोत्तम एयरलाइंस कंपनियों में से एक माना जाता था. लेकिन आज हालत ये है कि कोई इसे ख़रीदने को तैयार नहीं है. सरकार को ये कंपनी बेचने के लिए एक बार फिर कोशिश करनी पड़ रही है और वो भी मामूली शर्त पर। 

3. तीसरा कारण ये है कि सरकार के पास अपनी योजनाओं आदि को सुचारू ढंग से चलाने के लिए पर्याप्त धन नहीं होता है तो सरकार अपनी उन कंपनियों की हिस्सेदारी बेच देती है जो कोई फायदा नहीं दे रही है और उनमे पैसा लगाना भी सरकार को मुनाफा नहीं दे रहा या फिर आईपीओ लाकर सरकार कम्पनी का एक छोटा सा शेयर बेचती है जिस से सरकार की पैसो की कमी पूरी हो सके. 

इसका ताज़ा उदाहरण एलआईसी है. सरकार एलआईसी में पांच से दस फ़ीसदी हिस्सेदारी का आईपीओ लॉन्च कर सकती है.

अब हम आपको विस्तार से समझाते है की आखिर सरकार क्यों सरकारी कंपनियों को बेच रही है और ये कितना फायदेमंद है। 


पहले तो आप ये जान ले की सरकार उन्ही कंपनियों को बेचती है जो सरकार को  मुनाफा नहीं दे रही हो।सरकारी कंपनियां बेचने को लेकर सरकार की अपनी विशेष नीतियां हैं. सरकार के पास अलग-अलग समय पर बनाई गईं तमाम कंपनियां हैं. इनमें से कई कंपनियां बेहतर ढंग से चल रही हैं. वहीं कुछ कंपनियों की आर्थिक हालत समय के साथ ख़राब हो चुकी है.


नब्बे के दौर में जब उदारवाद की शुरुआत हुई थी तो सरकार ने गीता कृष्णन आयोग का गठन किया था. इस आयोग ने सरकारी कंपनियों को अलग-अलग श्रेणियों में बांटा था. एक श्रेणी उन कंपनियों की थी जो लगातार घाटे में चल रही थीं.वहीं, कुछ कंपनियां ऐसी थीं जिनमें कंपनियां और उत्पादन बंद हो चुका है लेकिन दफ़्तर चल रहे हैं. लोग काम नहीं कर रहे हैं लेकिन तनख़्वाह हर महीने दी जा रही है. वहीं, तीसरी श्रेणी उन कंपनियों की है जो काफ़ी लाभ कमाने की स्थिति में हैं


हाल ही में नीति आयोग ने एक बार फिर इन कंपनियों की सूची को देखकर विश्लेषण किया है कि कौन सी कंपनियां ऐसी हैं जिन्हें कोई ख़रीदना नहीं चाहेगा. कौन सी कंपनियां ऐसी हैं जिनमें निजी क्षेत्र अपनी रुचि दिखाएगा. और वो कौन सी कंपनियां हैं जिन्हें न बेचने की स्थिति में सरकार को भारी नुक़सान होगा.


लेकिन सवाल यह भी उठता है कि सरकार उन कंपनियों का चुनाव कैसे करती है जिनकी हिस्सेदारी बेची जा सकती है या जिन्हें पूरा का पूरा बेचा जा सकता है?



दरअसल, सरकार ये बात कंपनियों की सेहत देखकर तय करती है. कुछ कंपनियां ऐसी होती हैं जिन्हें पूरा का पूरा बेचने में सरकार को लाभ होता है. इसका ताज़ा उदाहरण एयर इंडिया है. इससे पहले भी ऐसी तमाम कंपनियां रह चुकी हैं जिन्होंने सरकार को फ़ायदा पहुंचाने की जगह ज़बरदस्त घाटा दिया है.वहीं, कुछ कंपनियां ऐसी होती हैं जिनकी कुछ हिस्सेदारी बेचकर सरकार को आर्थिक मदद मिल सकती है क्योंकि सरकार को अपनी योजनाएं चलाने के लिए धन चाहिए होता है और कंपनियों को भी इसका लाभ मिलता है.


सरकारी कंपनियों का शेयर बेचना कितना फायदेमंद है :

सरकारी कंपनियों को पूरी तरह शेयर धारकों के लिए उपलब्ध कराने या उनके कुछ हिस्से को बेचने का नुक़सान किसी को नहीं होता है. क्योंकि इससे कंपनी की शेयर आम लोग ख़रीद सकते हैं.शेयर के प्रदर्शन के लिहाज़ से बाहरी तत्व कंपनी की आर्थिक स्थिति का आकलन करते हैं. कंपनी की आर्थिक सेहत के लिहाज़ से नेतृत्व और नीतियों में सुधार किए जाते हैं. कंपनी के फ़ैसलों की समीक्षा की जाती है. हालांकि, कंपनी के पूरी तरह बिक जाने की स्थिति में काम करने वाले कर्मचारियों को अपने काम करने के ढंग में बदलाव करना होता है.

सरकार शेयर बेच के भी वो शेयर अपने पास ही रखती है,  कैसे ?....
एक उदाहरण इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन लिमिटेड (IOCL) का लेते हैं. इसमें सरकार की 51.5% डारेक्ट होल्डिंग है. इसके अलावा लाइफ़ इंश्योरेंस कॉरपोरेशन (LIC) के 6.5% शेयर भी उसमें हैं जो पूरी तरह सरकारी कंपनी है. इसका मतलब IOCL में सरकार की इनडारेक्ट होल्डिंग भी है.

तो अगर सरकार IOCL से अपनी डारेक्ट सरकारी होल्डिंग कम करती है तो इनडारेक्ट सरकारी होल्डिंग की वजह से फ़ैसले लेने की ताकत सरकार के हाथ में होगी. 

आर्थिक और व्यवसाय जगत के एक बड़े वर्ग का मानना है कि पिछले तीसेक सालों में जिस तरह से सरकारी कंपनियों को बेचा गया है वो विनिवेश था ही नहीं, बल्कि एक सरकारी कंपनी के शेयर्स दूसरी सरकारी कंपनी ने ख़रीदे हैं.इससे सरकार का बजट घाटा तो कम हो जाता है लेकिन न तो इससे कंपनी के शेयर होल्डिंग में बहुत फ़र्क़ पड़ता है, न ही कंपनी के काम-काज के तरीक़े बदलकर बेहतर होते हैं.



क्या सरकार LIC को बेच रही है ??


जी नहीं सरकार LIC को बेच नहीं रही है बल्कि आईपीओ  के जरिये विनिवेश कर रही है। अब ये आईपीओ और विनिवेश क्या होता है ?..... 


IPO क्या है ?.... 

जब कोई कंपनी पहली बार आम लोगों के सामने कंपनी का कुछ हिस्सा बेचने का प्रस्ताव रखती है तो इस प्रक्रिया को इनीशियल पब्लिक ऑफर (IPO) कहा जाता है. इसके लिए कंपनियां खुद को शेयर बाजार में लिस्ट कराकर अपने शेयर निवेशकों को बेचने का प्रस्ताव लाती हैं. लिस्टेड होने के बाद कंपनी के शेयर्स की खरीद और बिक्री शेयर बाजार में संभव होती है

IPO की आवश्यकता
किसी कंपनी के लिए अपने कारोबार को बढ़ाने के लिए बड़ी धनराशि की आवश्यकता होती है जिसके लिए कंपनी अगर किसी बैंक अथवा दूसरे माध्यम का सहारा लेती है तो कंपनी को अधिक मात्रा में ब्याज देना पड़ेगा साथ ही एक निश्चित समयावधि के अंदर वो कर्ज चुकाना भी पड़ेगा, और यह शर्ते किसी कंपनी के लिए ज्यादा परेशानी पैदा कर सकती है तो इसका एक आसान सा विकल्प है IPO, जिसके लिए कंपनी को कोई ब्याज नही देना पड़ता है और कोई निश्चित समयावधि भी नही है पैसे वापस करने की, तो यह एक फायदे का सौदा है।

विनिवेश क्या है ?.... 

विनिवेश को अंग्रेजी में DISINVESTMENT कहते है आपकी जानकारी के लिए बता दे की सरकार को निवेश करने से तमाम कंपनियों में शेयर हासिल हुए हैं. शेयर एक तरह की मिल्कियत (ownership) के सबूत होते हैं। विनिवेश प्रक्रिया के जरिए सरकार अपने शेयर किसी और पक्ष को बेचकर संबंधित कंपनी की मिल्कियत  (ownership) से भी छुटकारा पा जाती है और उसे दूसरी योजनाओं पर ख़र्च करने के लिए धन भी मिल जाता है।

विनिवेश का एक उद्देश्य कंपनी का बेहतर प्रबंधन होता है।1990, उदारीकरण की प्रक्रिया के तहत यह बात समझ में आई कि सरकार का काम कारोबार करना नहीं है, देश चलाना है,  इसलिए सरकार को सार्वजनिक कंपनियों से विनिवेश करके उनसे अलग हट जाना चाहिए।विनिवेश या तो किसी निजी कंपनी के हाथ किया जा सकता है या फिर उनके शेयर पब्लिक में जारी किए जा सकते हैं। जिन मामलों में सार्वजनिक कंपनियों के शेयर पब्लिक को जारी किए गए, उनमें विवाद कम देखने में आया जैसे ओएनजीसी के मामले में।



इसके अलावा, यह भी समझना ज़रूरी है कि निजीकरण और विनिवेश में अंतर है, निजीकरण में सरकार अपने 51 प्रतिशत से अधिक की हिस्सेदारी निजी क्षेत्र को बेच देती है जबकि विनिवेश की प्रक्रिया में वह अपना कुछ हिस्सा निकालती है लेकिन उसकी मिल्कियत बनी रहती है।


और भी आसान शब्दों में समझाए तो चलिए पहले एक व्यवहारिक तरीके से समझते है। आप ने 2 एकड़ जमीन 20 लाख में ख़रीदी यह क्रिया कहलाएगी निवेश अब आप ने अपनी आर्थिक हालत और बेहतर करने के लिए,  मुनाफा अर्जित करने के लिए उस जमीन का छोटा सा टुकड़ा बेच कर धन ले लिया यह क्रिया है विनिवेश ।सरकार भी पहले कुछ कम्पनियों में पैसा लगाती है फिर समय आने पर बेच कर धन निकाल लेती है यही विनिवेश है।



अब अपने अहम् मुद्दे पर बात करते है, बहुत से मौको पर LIC  सरकार की मदद की है जैसे सरकार जब भी मुश्किल में फंसती है तो एलआईसी किसी भरोसेमंद दोस्त की तरह सामने आई. इसके लिए एलआईसी ने ख़ुद भी नुक़सान झेला है.वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 2.1 लाख करोड़ रुपए का विनिवेश लक्ष्य रखा है जो कि अब तक का सबसे ज़्यादा है. इनमें से एलआईसी और आईडीबीआई से 90 हज़ार करोड़ रुपए हासिल करने की योजना है. 


बीमा बाज़ार में 30 नवंबर, 2019 की तारीख़ तक एलआईसी की हिस्सेदारी 76.28 फीसदी थी. साल 2019 के वित्तीय वर्ष में एलआईसी को 3.37 खरब रुपए की कमाई ग्राहकों से मिलने वाले प्रिमियम से हुई जबकि 2.2 खरब रुपए निवेश से रिटर्न के रूप में मिले. एलआईसी का ऐसेट अंडर मैनेजमेंट करीब 30 लाख करोड़ रुपये है. यह कंपनी भारत के 1.3 अरब लोगों में से करीब एक चौथाई लोगों को किसी न किसी तरह सेवा दे रही है. यह दुनिया की सबसे बड़ी बीमा कंपनियों में से एक है
साल 2019 के वित्तीय वर्ष में इक्विटी इन्वेस्टमेंट के तौर पर एलआईसी का निवेश 28.32 खरब रुपए रहा , जबकि 1.17 खरब रुपए क़र्ज़ के तौर पर रहा और 34,849 करोड़ रुपये मुद्रा बाज़ार में है. 
मौजूदा वित्तीय वर्ष के लिए सरकार ने विनिवेश का लक्ष्य 1.05 खरब रुपए रखा था जबकि 2020-21 के लिए इस लक्ष्य को बढ़ाकर 2.1 खरब रुपए कर दिया गया. वित्त सचिव राजीव कुमार ने कहा है कि सरकार को एलआईसी के आईपीओ से 70,000 करोड़ रुपए से ज़्यादा की उम्मीद है. 
ज़्यादा पुरानी बात नहीं जब साल 2015 में ऑयल एंड नेचुरल गैस कॉर्पोरेशन लिमिटेड (ओएनजीसी) के आईपीओ के वक़्त भारतीय जीवन बीमा निगम ने 1.4 अरब डॉलर की रक़म लगाई थी. चार साल बाद जब ख़राब क़र्ज़ों से जूझ रही आईडीबीआई बैंक को उबारने की बात आई तो एलआईसी ने एक बार फिर अपनी झोली खोल दी.
लेकिन अब हालात बदल गए हैं और सरकार एलआईसी में सौ फीसदी की अपनी हिस्सेदारी को कम करना चाहती है. वैसे अभी इस बारे में स्थिति स्पष्ट नहीं की गई है कि सरकार कितने फ़ीसदी शेयर आईपीओ के ज़रिए बाज़ार के हवाले करेगी.अगर सरकार एलआईसी में 50 फ़ीसदी से ज़्यादा की हिस्सेदारी रखती है तो इसका मतलब ये हुआ कि भारतीय जीवन बीमा निगम का प्रबंधन और बड़ी हिस्सेदारी सरकार के पास ही रहेगी. वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने एलआईसी में हिस्सेदारी की बिक्री का प्रस्ताव रखते हुए कहा था  की , "स्टॉक मार्केट में किसी कंपनी के लिस्ट होने से कंपनी अनुशासित होती है और इससे वित्तीय बाज़ारों तक उसकी पहुंच बनती है. साथ ही कंपनी की संभावनाएं खुलती हैं. ये खुदरा निवेशकों को भी होने वाली कमाई में भागीदारी का मौक़ा देता है."

पिछले कुछ वर्षो में LIC ने उतना अच्छा RESULT नहीं दिया :


जिहां ये सच है अपने पिछले मुनाफों के दम पर LIC ने खुद को संभाला है  'भरोसे का प्रतीक' मानी जानी वाली सरकारी बीमा कंपनी भारतीय जीवन बीमा निगम के पिछले कुछ वर्षो  के आँकड़े बहुत उत्साहजनक नहीं दिखाई देते. पिछले कुछ वर्षो में कंपनी के नॉन परफॉर्मिंग एसेट्स यानी एनपीए दोगुने स्तर तक पहुँच गए हैं.


कंपनी की सालाना रिपोर्ट के मुताबिक मार्च 2019 तक एनपीए का ये आंकड़ा निवेश के अनुपात में 6.15 फ़ीसदी के स्तर तक पहुँच गया है जबकि 2014-15 में एनपीए 3.30 प्रतिशत के स्तर पर थे. यानी पिछले पाँच वित्तीय वर्षों के दौरान एलआईसी के एनपीए में तकरीबन 100 फ़ीसदी का उछाल आया है.


एलआईसी की 2018-19 की सालाना रिपोर्ट के मुताबिक़ 31 मार्च 2019 को कंपनी के सकल एनपीए 24 हज़ार 777 करोड़ रुपए थे जबकि कंपनी पर कुल देनदारी यानी कर्ज़ चार लाख करोड़ रुपए से अधिक का था. एलआईसी की कुल परिसंपत्तियाँ 36 लाख करोड़ रुपए की हैं.


दो दशकों से मिल रही चुनौती के बावजूद ज्यादातर मानकों पर एलआईसी ने अपना वर्चस्व बनाए रखा है. टोटल प्रीमियम इनकम के आधार पर एलआईसी का मार्केट शेयर 2016-17 में 71.81 फीसदी था, जो 2017-18 में 69.36 फीसदी पर आ गया. नए बिजनेस प्रीमियम में 2017-18 में प्राइवेट बीमा कंपनियों की बाजार हिस्सेदारी 30.64 फीसदी थी



दरअसल, एलआईसी की ये हालत इसलिए हुई है क्योंकि जिन कंपनियों में उसने निवेश किया था उनकी माली हालत बेहद ख़राब हो गई है और कई कंपनियां तो दिवालिया होने की कगार पर पहुँच गई हैं. इनमें दीवान हाउसिंग रिलायंस कैपिटल, इंडियाबुल्स हाउसिंग फ़ाइनेंस, पीरामल कैपिटल और यस बैंक शामिल हैं.

LIC का शेयर बेचना कितना होगा फायदेमंद :
सरकारी कंपनी में हिस्सेदारी बेचने का फ़ायदा बहुत ज़्यादा है. अगर आप इसे एलआईसी के उदाहरण से समझना चाहें तो आईपीओ आने के बाद सरकार को एलआईसी की आर्थिक हालत से जुड़े दस्तावेज़ सूचकांक को उपलब्ध कराने होंगे. इस तरह दुनिया भर में बैठी संस्थाएं और स्वतंत्र विश्लेषक बिना किसी शुल्क के एलआईसी की आर्थिक सेहत का विश्लेषण कर सकती हैं.

एक अन्य बात ये है कि अक्सर एलआईसी को सरकारी कंपनी होने की वजह से दिल्ली से आए आदेशों का पालन करना पड़ता है.ये आदेश किसी डूबते बैंक, कंपनी या उपक्रम को ख़रीदने से जुड़े होते हैं. कई बार ये आदेश एलआईसी के हित में नहीं होते हैं. लेकिन एलआईसी को सरकारी दबाव के चलते ऐसे निर्णय लेने होते हैं. लेकिन आने वाले समय में जब पूरी दुनिया को एलआईसी की आर्थिक सेहत का ज्ञान होगा. तब एलआईसी ऐसे फ़ैसले लेने की स्थिति में नहीं होगी.


क्योंकि उसे पता होगा कि इसके फ़ैसलों का कंपनी के दस फ़ीसदी शेयर पर क्या असर होगा. अगर कंपनी बेहतर आर्थिक फ़ैसले लेगी तो कंपनी की कुल मार्केट वैल्यू में बढ़ोतरी होगी. ग़लत फ़ैसले लेने से मार्केट वैल्यू में गिरावट होगी.


अगर एलआईसी को लिस्ट कराया गया तो यह देश की सबसे बड़ी सूचीबद्ध वित्तीय सेवा कंपनी बन जाएगी. इससे मार्केटकैप के आधार पर टॉप कंपनियों के समीकरण बदल जाएंगे या जीवन बीमा में बाजार में LIC के बादशाहत को कड़ी टक्कर मिलेगी जिस से जीवन बीमा का बाजार और मजबूत होगा।

एलआईसी की लिस्टिंग देश के लिए फायदेमंद होगी. लोग एलआईसी के शेयर खरीदेंगे और MSCI इंडेक्स में भारत की हिस्सेदारी बढ़ेगी." रिन्यूअल प्रीमियम में एलआईसी की हिस्सेदारी 69.35 फीसदी है, जबकि सभी प्राइवेट कंपनियों की कुल हिस्सेदारी 30.65 फीसदी है.



लिस्टिंग से एलआईसी की ऐसेट्स की क्वालिटी में सुधार होगा. एलआईसी सरकारी कंपनियों को खरीद कर उन्हें राहत देती रही है. पिछले साल उसने IDBI बैंक में 21,000 करोड़ रुपये का निवेश किया था. इसने न्यू इंडिया एश्योरेंस और जनरल इंश्योरेस में भी 8 फीसदी हिस्सेदारी खरीदी, जिसके शेयर इश्यू प्राइस से 20 फीसदी नीचे थे .

एक्सपर्ट्स क्या रखते है राय :
बिज़नेस की दुनिया में एलआईसी मे विनिवेश के फ़ैसले का स्वागत किया जा रहा है.

एसोसिएशन ऑफ़ नेशनल एक्सचेंज्स मेंबर्स ऑफ़ इंडिया (एएनएमआई) के अध्यक्ष विजय भूषण कहते हैं, "एलआईसी का विनिवेश प्रस्ताव इस बजट का सबसे बड़ा आकर्षण है. ये सऊदी अरब की सरकारी तेल कंपनी आरामको के स्टॉक मार्केट में लिस्टिंग होने जैसी घटना है. एलआईसी का विनिवेश 'आईपीओ ऑफ़ दी डीकेड' है."

एम्के ग्लोबल फाइनैंशियल सर्विसेज के प्रबंध निदेशक कृष्ण कुमार कारवा कहते हैं, "कंपनियों के कामकाज और पारदर्शिता के लिहाज़ से देखें तो एलआईसी का आईपीओ एक बहुत बड़ा सकारात्मक क़दम है. इससे आने वाले सालों में सरकार को पैसे जुटाने के लिए ज़्यादा मौके बनेंगे."


मेट्रोपॉलिटन स्टॉक एक्सचेंज के सीईओ बालू नायर की राय में, "एलआईसी के आईपीओ का निवेशक बड़े उत्साह से इंतज़ार कर रहे हैं. इस क़दम से प्राइमरी मार्केट से पैसा जुटाने में प्रोत्साहन मिलेगा."

कुल मिलाकर आप ये समझे एलआईसी बेचना सरकार के लिए घाटे का सौदा हो सकता है किन्तु ये आम जनता के लिए फायदेमंद है क्यूंकि इसके शेयर आम लोगो के लिए अब उपलब्ध रहेंगे, काम में पारदर्शिता आएगी, निवेशकों के बिच मार्केटिंग बढ़ेगी, एलआईसी की ऐसेट्स की क्वालिटी में सुधार होगा,MSCI इंडेक्स में भारत की हिस्सेदारी बढ़ेगी, देश की सबसे बड़ी सूचीबद्ध वित्तीय सेवा कंपनी बन जाएगी, चूँकि इसके कुछ शेयर अब पब्लिक होंगे तो कंपनी अब निजी तौर पर  बेहतर आर्थिक फ़ैसले लेगी तो कंपनी की कुल मार्केट वैल्यू में बढ़ोतरी होगी, सरकार को एलआईसी की आर्थिक हालत से जुड़े दस्तावेज़ सूचकांक को उपलब्ध कराने होंगे और इस तरह दुनिया भर में बैठी संस्थाएं और स्वतंत्र विश्लेषक बिना किसी शुल्क के एलआईसी की आर्थिक सेहत का विश्लेषण कर सकती हैं.

सरकारी कंपनियों में कामकाज का तरीक़ा प्रोफेशनल नहीं रह गया है और उस वजह से बहुत सारी सरकारी कंपनियां घाटे में चल रही हैं जिसके कारण विनिवेश का फैशला  लिया जाता है। इसलिए ऐसी कंपनियों  निजीकरण किया जाना चाहिए जिससे काम-काज के तरीक़े में बदलाव होगा और कंपनी को प्राइवेट हाथों में बेचने से जो पैसा आएगा उसे जनता के लिए बेहतर सेवाएं मुहैया करवाने में लगाया जा सकेगा.


सरकार एयर इंडिया क्यूँ बेच रही है ?..... 

एक नजर एयर इंडिया पर 
टाटा एयरलाइन ने 1932 में यह सर्विस शुरू की थी। 15 अक्टूबर 1932 को जेआरडी टाटा ने कराची से मुंबई की फ्लाइट खुद उड़ाई थी। वे देश के पहले लाइसेंसी पायलट थे। 1946 में इसका नाम बदलकर एअर इंडिया हुआ था। एयर इंडिया पहले 'टाटा एयरलाइंस' थी और आज़ादी के बाद यानी 1947 में इसकी 49% भागीदारी सरकार ने ले ली थी.एयर इंडिया की पहली अंतरराष्ट्रीय उड़ान 8 जून, 1948 को लंदन के लिए थी. आजादी के बाद 1953 में इसका नेशनलाइजेशन हुआ। डोमेस्टिक मूवमेंट के लिए इंडियन एयरलाइन्स और इंटरनेशनल फ्लाइट्स के लिए एअर इंडिया बनाई गई. दोनों कंपनियों के ज्वाइंट एंटरप्राइज के तौर पर वायुदूत कंपनी शुरू हुई जो रीजनल फीडर कनेक्टिविटी देती थी. दिल्ली का इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा इसका प्रमुख हब है.एयर इंडिया ने अब तक सबसे ज़्यादा लोगों को सुरक्षित एयरलिफ़्ट कराया है. 1990 में इराक़ ने जब क़ुवैत पर हमला किया तब 59 दिनों के भीतर 10 लाख से ज़्यादा भारतीयों को एयर इंडिया के 488 विमानों से सुरक्षित भारत पहुंचाया गया.कई सालों बाद 1993 में वायुदूत का इंडियन एयरलाइन्स में मर्जर हो गया जिससे पूरे ग्रुप पर कर्ज बढ़ गया।

एयर इंडिया पर है हजारो करोड़ का कर्ज 
एयर इंडिया पर तकरीबन 60 हज़ार करोड़ का क़र्ज़ है. इस क़र्ज़ को कम करने के लिए सरकार ने ऋण विशेष इकाई (एसपीवी) का गठन भी किया है. जिसके बाद ख़रीदार को तकरीबन 23,286 करोड़ रुपए चुकाने होंगे. इसके साथ ही सरकार ने कुछ और शर्तों में भी ढील दी है, ताकि इस बार उन्हें ख़रीदार मिल सकते.इस बार सरकार 76 फ़ीसदी के बजाए 100 फ़ीसदी हिस्सेदारी बेचना चाहती है.पिछली बार के मुकाबले अब ख़रीदारों को क़र्ज़ की रकम भी कम चुकानी होगी. और तो और एयर इंडिया का रियल एस्टेट एसेट इस बार बिक्री के लिए नहीं रखा गया है. यानी इस बार सरकार केवल 'ऑपरेशनल एसेट' बेचना चाहती है.

एयर इंडिया के पिछरने का कारण  
1990 का दशक था और देश उदारीकरण के दौर से गुज़र रहा था. इसी दशक के आख़िर में घरेलू उड़ान के मैदान में कई नई कंपनियों ने पैर रखे थे.इनमें से जेट एयरवेज़ इंडिया लिमिटेड भी एक कंपनी थी जो एक अप्रैल 1992 में बनी थी.1993 में चार बोइंग 737 विमानों के साथ पहली बार उड़ान सेवा शुरू करने वाली ये कंपनी साल 2012 के आते-आते देश की सबसे बड़ी निजी विमानन कंपनी बन गई.भारतीय बाज़ार में यात्री शेयर की बात करें तो एयर इंडिया 18.8 फ़ीसदी इसके बाद  26.3 फ़ीसदी शेयर जेट एयरवेज़ के नाम था और उसके बाद इंडिगो 18.7 फ़ीसदी मार्केट शेयर के साथ थी.कहीं न कही  जेट एयरवेज से एयर इंडिया को करी टक्कर मिली और अब समय बदल गया है और आज आलम ये की सरकार को इसकी 100 फीसदी हिस्सेदारी बेचनी पर रही है। 


इसके पीछे के कारणों में सबसे अहम कारण ये है कि उदारीकरण के बाद प्रतिस्पर्धा बढ़ी और कई कंपनियां सस्ती हवाई यात्रा देने के लिए सामने आईं. इनमें इंडिगो और स्पाइसजेट जेट एयरवेज़ प्रतियोगी थीं जो कम दाम में उड़ान सेवाएं देने लगीं. बाज़ार में टिकने के लिए कंपनी सस्ती यात्रा देने की कोशिश करती है."इसके साथ-साथ ईंधन की क़ीमतों का महंगा होना और भारतीय मुद्रा का कमज़ोर होना भी एयर इंडिया की इस हालत के पीछे बड़ा कारण है." 

उड़ान कंपनियां जेट फ्यूल यानी विमानों के लिए ख़ास ईंधन का इस्तेमाल करती हैं जिसे एविएशन टरबाइन फ्यूल (एटीएफ़) कहते हैं. कंपनी के कुल खर्च का 40 से 50 फीसदी हिस्सा ईंधन खर्च होता है.जैसे ही अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की कीमतें बढ़ती हैं इसकी सीधा असर कंपनी पर पड़ता है. जनवरी 2008 में पहली बार कच्चे तेल की कीमतें अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में 100 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंची थीं. आने वाले महीनों में कीमतें और बढ़ीं. उस वक्त एयरलाइन कंपनियों की हालत बुरी हो गई थी.कंपनियां आख़िर टिकट के दाम कितना बढ़ा सकती हैं? कंपनियों ने उस वक्त नुक़सान कम करने के लिए एक फ्यूल सरचार्ज जोड़ दिया था. लेकिन जब बाजार में कच्चे तेल की कीमत घटी उसके बाद ये एक्स्ट्रा चार्ज उस वक़्त की सरकार द्वारा नहीं हटाए गए, वही निजी कंपनियों ने अपनी टिकट की दरों को घटाया जिस के कारण  कंपनी को नुक्सान उठाना परा.  

एविएशन एक्सपर्ट मानते  हैं कि 2008 के बाद से एविएशन इंडस्ट्री को लगातार मुश्किलों का सामना करना पड़ा है. बीते एक साल में कई चीज़ें एविएशन इंडस्ट्री के ख़िलाफ़ गई हैं.

"पहली बात तो ये कि तेल की कीमतों में भारी उछाल आया है. ख़ास तौर पर हिंदुस्तान में हम सबसे महंगा तेल खरीदते हें. इस कारण कंपनी के खर्च (कॉस्ट ऑफ़ ऑपरेशन) पर सीधा असर पड़ता है."

"दूसरा ये कि डॉलर के मुक़ाबले भारतीय मुद्रा कमज़ोर हुई है. इस कारण भी एयरलाइन्स का खर्च, जहाज़ खरीदने का, जहाज़ पर लोन, जहाज़ के पुर्जे, विदेशी पायलट- सभी का खर्च भी बढ़ जाता है. इस कारण कंपनी से अधिक पैसा बाहर जाता है."


मौजूदा हालात के बारे में वो समझाते हैं, "एविएशन एक ऐसी इंडस्ट्री है जिसमें कैश का बाहर जाना काफी तेज़ी से होता है. लगातार कंपीटीशन बढ़ रहा है, एयर विस्तारा है, इंडिगो नए जहाज़ ला रही हैं. वहीं एयर इंडिया की हालत ऐसी हो गयी है की अब ये मुनाफा भी नहीं दे पा रही है। 

खरीदार के लिए होगी बरी चुनौती :
1.सरकार की ओर से शर्तों में ढील देने का ये मतलब कतई नहीं कि ख़रीदार आसानी से मिल जाएंगे. किसी भी ख़रीदार के लिए ये राह आसान नहीं होगी.

2.ख़रीदार को तकरीबन साढ़े 23 हजार करोड़ तो क़र्ज़ के देने होंगे, साथ ही इसकी चिंता भी करनी होगी की कम हो रही पैसेंजर ग्रोथ से कैसे निपटा जाए.

3.एक साल पहले एयर इंडिया का सालाना घाटा जहां 5000 करोड़ का था, इस बार बढ़ कर 8000 करोड़ हो गया था. इसलिए ख़रीदार को मानसिक तौर पर कुछ साल कंपनी के साथ साथ घाटा सहने की आदत भी होनी चाहिए.

4.इतना ही नहीं गिरते रुपए ने एविएशन सेक्टर में 'ऑपरेशनल लॉस' को और बढ़ा दिया है. अब ईंधन ख़रीदने में ज़्यादा ख़र्च करना पड़ता है. इसके लिए भी तैयार रहना होगा.

5.जो भी ख़रीदार एयर इंडिया को ख़रीदेगा उसको नए एयर फ्लीट भी ख़रीदने होंगे. एयर इंडिया का फ्लीट अब बहुत पुराना हो गया है. ख़रीदार को नए निवेश करने को भी तैयार होना होगा.

6.कुल मिला कर क़र्ज़ के आलावा ख़रीदार को एयर इंडिया को दोबारा ज़िंदा करने के लिए तकरीबन 25 हजार करोड़ और लगाना होगा.

7.एयर इंडिया पर इस वक्‍त करीब 80 हजार करोड़ रुपये का कर्ज है. खरीदार को इसमें से 3.26 बिलियन डॉलर का कर्ज खुद चुकाना होगा.

8.साल 2018-19 में, एयर इंडिया का शुद्ध घाटा 8,556.35 करोड़ रुपये होने का अनुमान है.

9.एयर इंडिया पिछले 10 साल से घाटे में चल रही है. 2012 में सरकार को इसे 4.5 बिलियन डॉलर का बेलआउट पैकेट देना पड़ा था.

10.सेंटर ऑफ एशिया पैसिफिक एविएशन के अनुसार, एयर इंडिया को अगले दो साल में कम से कम 2 बिलियन डॉलर का नुकसान हो सकता है.

11.किसी निजी एयरलाइन से मुकाबला करने में एयर इंडिया नाकाम रही है. सरकार ने पिछले छह साल में एयर इंडिया में 30,520.21 करोड़ रुपये का निवेश किया, मगर रिटर्न्‍स में नुकसान ही हुआ.

2018 के बेचने के नियम 
सरकार 76% शेयर बेचना चाहती थी51 हजार करोड़ रुपए का कर्ज था, खरीदार को 33392 करोड़ का भार उठाना थाखरीदार की नेटवर्थ 5000 करोड़ रुपए होना जरूरीबोली लगाने वाले को पिछले 5 साल में से कम से कम 3 साल फायदे में होना जरूरीकंसोर्शियम के प्रमुख सदस्य की हिस्सेदारी 51%, अन्य सदस्यों की 20% होनी जरूरी

2020  के बेचने के नियम 
100% हिस्सेदारी बेची जाएगी60 हजार करोड़ रुपए का कर्ज, खरीदार को 23286 करोड़ की जिम्मेदारी लेनी हैखरीदार की नेटवर्थ 3500 करोड़ रुपए होनी चाहिएबोली लगाने वाले को पिछले 5 साल में से कम से कम 3 साल फायदे में होना जरूरी बोली लगाने वाले के मुनाफे में होने की शर्त खत्मप्रमुख सदस्य की हिस्सेदारी 26% अन्य सदस्यों की 10% जरूरी


एयर इंडिया के कुल 16077 कर्मचारी, स्थायी कर्मचारियों के लिए 3% शेयर रिजर्व रखे जाएंगे।
न्यूज एजेंसी के मुताबिक 1 नवंबर 2019 तक एयर इंडिया और सब्सिडियरी एयर इंडिया एक्सप्रेस के कुल 16,077 कर्मचारी थे। विनिवेश के तहत एयर इंडिया के स्थायी कर्मचारियों को 3% शेयर रियायती कीमतों पर दिए जाएंगे। एम्प्लॉयी स्टॉक ऑप्शन प्रोग्राम के तहत 98 करोड़ शेयर रिजर्व रखे जाएंगे। न्यूज एजेंसी ने सूत्रों के हवाले से बताया कि एयर इंडिया को बेचने की सरकार की योजना पर चर्चा के लिए कर्मचारी संगठन बैठक करेंगे। एयर इंडिया के कर्मचारियों के करीब 12 संगठन हैं।

स्टाफ जरूरत से ज्यादा नहीं: एयर इंडिया

नागरिक उड्डयन मंत्री हरदीप सिंह पुरी का कहना है कि एयर इंडिया एक्सप्रेस के साथ एयर इंडिया एक बड़ा एसेट है। बोली में सफल रहने वाले को एयर इंडिया ब्रांड के तहत ही संचालन जारी रखना होगा। एयर इंडिया के चेयरमैन और एमडी अश्विनी लोहानी ने कहा कि एयरलाइन में जरूरत से ज्यादा स्टाफ नहीं है। रिटायर होने वाले कर्मचारियों के मेडिकल लाभों का मुद्दा सुलझाया जा रहा है।
वो मुख्य कारण जिसके चलते सरकार को बेचना पर रहा हो एयर इंडिया :
1.एयर इंडिया पर इस वक्‍त करीब 60 हजार करोड़ रुपये का कर्ज है. खरीदार को इसमें से  23,286 करोड़ रुपए  का कर्ज खुद चुकाना होगा.

2.साल 2018-19 में, एयर इंडिया का शुद्ध घाटा 8,556.35 करोड़ रुपये नुक्सान।
एयर इंडिया पिछले 10 साल से घाटे में चल रही है.

3.2012 में सरकार को इसे 4.5 बिलियन डॉलर का बेलआउट पैकेट देना पड़ा था.

4.सेंटर ऑफ एशिया पैसिफिक एविएशन के अनुसार, एयर इंडिया को अगले दो साल में कम से कम 2 बिलियन डॉलर का नुकसान हो सकता है.

5.किसी निजी एयरलाइन से मुकाबला करने में एयर इंडिया नाकाम रही है. सरकार ने पिछले छह साल में एयर इंडिया में 30,520.21 करोड़ रुपये का निवेश किया, मगर रिटर्न्‍स में नुकसान ही हुआ. 

अमेरिका के पास भी नहीं है निजी एयरलाइन्स 
अमेरिका के पास खुद की सरकारी एयरलाइंस नहीं है क्यूँ  ?...  तो इसका जवाब है, अमेरिका के  पास पहले निजी एयरलाइन्स थी पर बाद में अमेरिका ने  निजी एयरलाइन्स को निष्क्रिय कर दिया। 


वास्तव में द्वितीय विश्व युद्ध से पहले, अमेरिका में एक सरकारी एयरलाइन, पैन अमेरिकन थी। जिसने युद्ध के बाद भी अपनी स्थिति को बनाए रखने की कोशिश की, लेकिन अमेरिकी सरकार द्वारा इसे खारिज कर दिया गया और इसके बजाय प्रतिस्पर्धी निजी एयरलाइंस चुनने का फैसला किया गया। परिणामस्वरूप, एयरलाइनों के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ गई, किराए कम हो गए और मार्ग उच्च स्तर पर विकसित हुए । आज अमेरिका के पास विश्व की टॉप एयरलाइन्स है  जैसे :- Alaska Airlines, Allegiant Air, American Airlines ......  

इसलिए आप सब से विनम्र निवेदन है की, अगर आप सरकार के काम पर सवाल करते है तो करिये और इस देश का नागरिक होने के कारन हमारे पास ये अधिकार है, किन्तु सवाल उस वक़्त होना चाहिए जब हमारे पास उस विषय से जुड़ी तमाम जानकारी हो। 

आप बजट को और डेप्थ में जाकर पढ़ना चाहते है तो मै आपको निचे गवर्नमेंट की ऑफिसियल साइट की बजट लिंक दे रहा हूँ जिसको आप खोल कर पढ़ और समझ सकते है की आखिर पूरा बजट है क्या। 


अगर इस पोस्ट में मैंने कही कोई गलती की हो तो माफ़ करे मै कोई अर्थशास्त्री नहीं किन्तु  रिसर्च करके आसान से आसान भाषा में आपलोगो को इस सत्र के पहले सवाल का उत्तर देने की कोसिस की है। ग्रामेटिकल मिस्टेक्स भी हुए हो तो माफ़ करे और अगर आपके पास भी कोई सवाल हो तो मुझे मेल करे भारत आईडिया के मेल आईडी पर आपको एक सतुष्टिपूर्ण जवाब देने की हम कोशिश करेंगे। 

admin@bharatidea.com


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